अपेक्षाएं और हम
मानव जीवन एक अनमोल उपहार है, जो
प्रकृति की ओर से हमें मिलता है। इसका व्यर्थ होना प्रकृति का व्यर्थ होना है और
आदिकाल से प्रकृति ही सर्वशक्तिमान सत्ता के रूप में सब नियंत्रित करती आ रही है,
ऐसे में यदि हम अपने जीवन के साथ कुछ अच्छा नहीं करते हैं तो सीधे अर्थों में उस
सर्वशक्तिमान प्रकृति के प्रयास को व्यर्थ करते हैं। हमारे
जन्म के साथ ही जो एक महत्वपूर्ण विचार (वस्तु रूप में) हमारे साथ जुड़ जाता है - वह
है अपेक्षा। अपेक्षा अपने आप में एकल शब्द नहीं है, इसमें सम्मिलित हैं - लोगों की
आशाएं, हमारी अपनी चाह और आजीवन इन दोनों के बीच मौजूद रहने वाली तुलना। इस प्रकार
हम कह सकते हैं कि इन तीनों का ही सम्मिलित रूप है – अपेक्षा(एं)।
अपेक्षाएं मुख्यतः तीन तरह की होती हैं। पहली वे,
जो हम खुद से करते हैं और दूसरी वे जो हम दूसरों से करते हैं तथा इनके बाद अंतिम
और तीसरी वे, जो दूसरे हमसे करते हैं। मूलतः हर व्यक्ति खुद से और दूसरों से रखने
वाली अपेक्षाओं में ही उलझा रहता है। इसमें भी उसका सबसे ज़्यादा समय गुजरता है, उन
अपेक्षाओं की चिंता करने में, जिन्हें वह दूसरों से करता है और इसके बाद वह उन
अपेक्षाओं की चिंता करता है जिन्हें वह खुद से करता है। कारण यह है कि मनुष्य जीवन
इतना अधिक सुविधाजीवी हो गया है कि वह दूसरों पर आश्रित होकर रह गया है। अपना हर
काम कराने के लिए हमारे पास कोई ना कोई विकल्प है। इसे हम ऐसे समझें कि यदि हमें एक
कप चाय भी पीना हो तो तुरंत एक हुक्म देते हैं कि जरा एक कप चाय बना/पिला दो। अब
इसकी तामील करने वाला कोई नौकर हो, मां, बहन, बेटी या बीवी हो और सुविधाजीवी होने
का यह रोग हमें बचपन से ही लग जाता है। रोजमर्रा के गिने-चुने कामों को छोड़कर शेष
के लिए आदमी दूसरों पर ही निर्भर रहता है।
हम जो अपेक्षाएं खुद से रखते हैं, आम तौर पर
उन्हें सबसे आसान व कम रखते हैं और जो अपेक्षाएं हम दूसरों से रखते हैं वे भले ही
आसान हों या मुश्किल लेकिन उन्हें कम कहना अपने आप से झूठ बोलना ही होगा। इनके बाद
वे अपेक्षाएं जो दूसरे हमसे रखते हैं, उनकी तो फिक्र करने का भी समय हमारे पास
नहीं है, उन्हें पूरा करने का ख़्याल तो छोड़ ही दीजिए।
अधिकांश (या कहिए लगभग सभी) लोग जो अपेक्षाएं खुद
से करते हैं, वे दो तरह से करते हैं - ज्यादातर उम्मीद से ज्यादा या फिर उम्मीद से
कम। अपनी क्षमताओं को परख कर हम अपनी अपेक्षाओं को अपनी शक्ति बना सकते हैं लेकिन
जब तक हम यह समझ पाते हैं तब तक समय निकल चुका होता है। अगर हम अपनी अपेक्षाएं उम्मीद
से ज्यादा रखते हैं तो फिर हमें मेहनत भी ज्यादा करनी होगी और यदि हम ऐसा नहीं
करते हैं तो फिर हमारे हाथ सिवाय निराशा और कुंठा के कुछ नहीं लगता। उम्मीद से
ज्यादा अपेक्षा करना बिल्कुल भी गलत नहीं है यदि आप इसके लिए कड़ी मेहनत करने को
तैयार हैं और इसके साथ ही यदि आप असफलताओं को स्वीकार करने की हिम्मत भी रखते हैं।
हालांकि, हम कड़ी मेहनत करें और असफलता हाथ लगे यह होता नहीं लेकिन फिर भी बुरी से
बुरी परिस्थिति/परिणाम के लिए तैयार रहना ही तो मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी शक्ति और
उपलब्धि है। अपने आपसे अपेक्षा करते समय हमें अपनी सीमाओं का ध्यान रखना
चाहिए। अच्छी तरह आत्मविश्लेषण के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए। आपने क्रिकेट का
मैच तो अवश्य देखा होगा (मुझे यह उदाहरण अच्छा लगता है) उसमें हर बॉल पर हर
खिलाड़ी की सीमा की परख होती है। यदि बॉल ख़राब होगी तो बॉलर पिटेगा और यदि बॉल अच्छी है तो
दूसरी टीम का रन-औसत घटेगा। बस यही असल तैयारी है, आप अपना सौ प्रतिशत देते रहिए
परिणाम अंततः अच्छा ही रहेगा। कई बार पूरी तैयारी के बावज़ूद भी परिणाम उलट हो
जाता है, यह कोई बड़ी बात नहीं है। एक अच्छी गेंद पर भी चौका या छक्का लग ही जाता
है लेकिन यह पूरे मैच के दौरान लगातार नहीं हो सकता। तो हार मत मानिए और फिर से
लौटिए और उतनी ही अच्छी या बेहतर गेंद फेंकिये, फिर देखिये आप बहुत जल्द अपनी किसी
न किसी अपेक्षा का विकेट गिरा ही देंगे। इसे हम एक
उदाहरण से और समझ सकते हैं - जैसे आप अपने साथ क्या रखना चाहते हैं, यह आप पर
निर्भर करता है। इसके लिए आप अपनी किसी भी एक जेब को ले सकते हैं, अब यह आप पर है कि
आप उसमें क्या रखेंगे। आप चाहें तो उसमें मिट्टी, कंकड़, पत्थर रख सकते हैं, जो
जीवन भर आपको परेशान करेंगे। या फिर आप चाहें तो उसमें चिल्लर/सिक्के रख सकते हैं,
जिनका मूल्य बहुत कम होगा और खनक व भार ज्यादा। आप स्वयं उसमें रखी जा सकने वाली
वस्तु का मूल्य व भार तय कर सकते हैं। वैसे भी आम धारणा यह है कि हल्की वस्तु का
दाम भारी यानी ज्यादा होता है। मूल्यवान वस्तुओं का किसी के भी पास होना, उनके कम
उपयोग की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा देता है। आप अपनी जेब में रखी जा सकने वाली
वस्तुओं का चयन खुद कर सकते हैं। चाहे चिल्लर रखिए, दस, बीस, पचास, सौ, पाँच सौ या
दो हजार के नोट रखिये या उनसे भी मूल्यवान सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात रखिये। आप
स्वयं के लिये इन सबसे अनमोल चीज़ें भी खोज सकते हैं। यही आपको अपने जीवन के साथ
करना है, आपको कौन से अनुभव संजोने हैं और कौन से छोड़ देने हैं, यह आपको ही तो तय
करना है। कौन सी अपेक्षाओं के लिए आप निरंतर प्रयास करेंगे और किन्हें छोड़ देंगे
यह भी आपको ही तय करना है। यही सरल सा फलसफा, सुख और दुख के बीच संयम बनाए रखने का
सबसे आसान तरीका है और अपने आप से की जाने वाली अपेक्षाओं के मामले में यह बहुत
कारगर सिद्ध होता है।
अब बात करते हैं, उन अपेक्षाओं की जो हम दूसरों से
करते हैं। दूसरों से अपेक्षा करते समय तो बहुत सावधान रहने की जरूरत है। इसके लिए
हमें बहुत तैयारी की जरूरत होती है। जैसे, मैं किसी एक पैर वाले आदमी से दौड़ने की
अपेक्षा नहीं कर सकता लेकिन वह चले भी ना, इसकी अपेक्षा करना बहुत बुरा है। इतने
पर भी मैं कहूंगा कि हम एक पैर वाले आदमी से दौड़ने की उम्मीद करें और कोशिश करें कि
हम उसके लिये दूसरे पैर (या उसके विकल्प) की व्यवस्था कर सकें क्योंकि हमारी
दौड़ने की अपेक्षा तो कोई दो पैर वाला व्यक्ति ही पूरी कर सकता है। आदमी की एक खास बात है कि जब वह दूसरों
को परेशानी दे रहा होता है तो वह इस बात का अहसास तक नहीं कर पाता कि उसकी वजह से
किसी को परेशानी भी हो रही है। ठीक वैसे ही जैसे अपने खर्राटों की आवाज हम खुद
नहीं सुन सकते या तेज आवाज में संगीत बजाते वक्त हम यह महसूस नहीं कर सकते कि
कौन-कौन इस सब से परेशान हो रहा है, ऐसी
कितनी बातें लिखी/बताई जा सकती हैं। बस दूसरों से की जाने वाली अपेक्षाओं का यही सरल मनोविज्ञान है। एक
बार हम इसे समझ लें तो फिर कुछ भी पाना/करना या करवाना मुश्किल नहीं है।
आइये, अब बात करें उन अपेक्षाओं की जो दूसरे हमसे करते हैं। तो यहां
अपेक्षाएं गौण हो जाती हैं और उन अपेक्षाओं को करने वाला व्यक्ति मुख्य। तीसरी
श्रेणी की इन अपेक्षाओं के साथ भी न्याय करना बहुत जरूरी है अन्यथा ये भी हमारे
लिए समस्या खड़ी कर सकती हैं और इनका (या कहिए हर समस्या का) स्थाई समाधान है –
संवाद। संवाद के जरिए हमें पता चलता है कि दूसरे हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं और हम
उन्हें बता सकते हैं कि उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए क्या-क्या जरूरी है। संवाद
करते समय अपनी शक्तियों और सीमाओं का स्पष्ट वर्णन करें तो सामने वाला व्यक्ति
आपसे सहमत अवश्य होगा। झूठ बोलकर तो हम खुद को ही धोखा दे सकते हैं, वैसे भी सच
बोलने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि हमें याद नहीं रखना होता कि किससे और क्या बोला/बताया
था। इस तरह हम चाहें तो दूसरों की अपेक्षाओं के साथ भी न्याय कर सकते हैं।
अंत में, हमें सर्वाधिक फिक्र उन अपेक्षाओं की करनी चाहिए जो हम
दूसरों से करते हैं क्योंकि ये अपेक्षाएं द्विआयामी होती हैं, बिल्कुल दोधारी
तलवार की तरह। दूसरों से कोई भी अपेक्षा करने से पहले उनके बारे में अधिकाधिक जान
लेना चाहिए और फिर मिलकर इन अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। इसके
बाद, खुद से की जाने वाली अपेक्षाओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए तथा इनके बारे में
कोई भी निर्णय सम्यक् चिंतन और आत्मविश्लेषण के बाद ही करना चाहिए। कड़ी मेहनत और पूर्ण-समर्पण
ही खुद से की जाने वाली इन अपेक्षाओं की नैय्या पार लगा सकते हैं। सबसे बाद में,
हमें कुछ ख्याल दूसरों की अपेक्षाओं का भी करना चाहिए क्योंकि कई बार सामने वाला
हमें हमसे ज्यादा जान रहा होता है और हो सकता है कि वह हमारे लिए कुछ ऐसा बहुत
अच्छा सोच रहा हो जिसकी हमनें कल्पना भी ना की हो। यदि हम इस तरह कार्य करें तो मैं
यह दावे से कह सकता हूँ कि 'अपेक्षाएं और हम' एक साथ कुछ बहुत अच्छा कर सकते हैं और एक सफल जीवन का निर्वाह कर सकते हैं तथा उस सर्वशक्तिमान
प्रकृति के अमूल्य उपहार का सम्मान करते हुए उसके प्रयास को अधिकाधिक सफल बना सकते
हैं।
सुचिंतित आलेख। बुद्ध कहते थे जैसे ही हम किसी से अपेक्षा रखते हैं दुःख की शुरूआत उस पल से शुरू हो जाती है जिस क्षण से हम अपेक्षा रखते हैं।
ReplyDeleteशुक्रिया दादा
Deleteअपेक्षाओं का प्रभावशाली चित्रण , बहुत खूब ।
ReplyDeleteशुक्रिया दोस्त।
Deleteअपेक्षाओं का चरमोत्कर्ष सतर्कता ही है।
ReplyDeleteचाहे वह पहला, दूसरा या तीसरा ही क्यों न हों।
अपेक्षाएँ एक प्रकार से किसी के लिए प्रेरणा हों, तो किसी के लिए सबक़ और कहीं किसी के लिए जीवनानुभव का एहसास दिलाने वाली मनोदशा की प्रक्रिया हैं।
अपेक्षाओं को का़यम रखने में संतुलन बनाये रख़ना, हर एक के लिए अपने आप में बहुत बडी चुनौती है।
दर असल अपेक्षाओं पर सटीक विश्लेषण करना मुश्किल तो है ही, पर आपका आलेख पढ़कर अच्छा लगा अजय भाई...🤝⭐⭐⭐⭐⭐👍
Weldon sir. Continue...
ReplyDeleteअजय जी आपने अपेक्षाओं की बहुत सुन्दर व्याख्या की है । आपकी लेखनी सशक्त है लिखते रहिये बहुत आगे तक जाएंगे !!
ReplyDeleteYa it's true that we get this precious life by God. It's our responsibility to do something great and achieve desire results. As well as talking about expectations, we can expect only from those where trust should be their.. ☺
ReplyDeleteWelcome. Nice write up. Continue
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteजय हिन्द अजय जी।'अपेक्षाएं और हम',मेरी अपेक्षा पर खरा उतरता है। कृपया, लिखते रहें। ज्ञानदेव
ReplyDeleteभैया,
ReplyDeleteवर्तमान परिवेश के अनुसार मानसिक विकार(depression) का सबसे बड़ा कारण अपेक्षा है। चाहे हम खुद से करे या दूसरों से। ऐसे में अपेक्षाओं पर काबू करना ही बेहतर विकल्प है।
बेहतरीन लेख 👏👏👏👌👌👌
ReplyDeleteअजय भाई आपने मानव जीवन का सही उपयोग और आज के समय को ध्यान मै रखते रखते हुए बहुत अच्छा विचार जो आपने लेख के माध्यम से बताया है
ReplyDeleteअपेक्षा पर अत्यंत सटीक विचार,
ReplyDeleteजीवन में अगर हमें किसी से अपेक्षा रखनी चाहिए वो है स्वयं हम और केवल हम।
तभी असीम सुख शांति की अनुभूति संभव है।
बहुत सुंदर लेख है,,, विचारों के तारतम्य में बहते हुए पता नहीं चला कब समाप्त हो गया...
ReplyDeleteअद्भुत गुरु जी
ReplyDeleteयह सभी व्यक्तियों के जीवन का सत्य है।
इसे पढ़ने के बाद हमें यह अनुभूति हुई जीवन में हमें निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए सफलता एक दिन अवश्य प्राप्त होगी
वीर तुम बढ़े चलो
🙏🙏🙏
अगर में कुछ समझ पाता तो कॉमेंट ज़रूर करता.. लगता है बौद्धिक क्षमता के विकास का समय आ चुका है...
ReplyDeleteAshart sahmat
ReplyDeleteOr usse bhi achhi baat ye rahi ki concept bahut achhe se clear hua hai, aur itna hi nhi "sone pr suhaga" ye ki jeeva me kaam aane vaali baat hai.
तीन तरह की अपेक्षाओं का क्रम एकदम सही लिखा है आपने। और इस लेख को पढ़कर मेरे मन में जो विचार उत्पन्न हुए हैं, मैं उन्हें यहाँ आगे लिख रही हूँ ।
ReplyDeleteसर्वाधिक फिक्र हमें उन अपेक्षाओं की करनी चाहिए जो हम दूसरों से करते हैं। बिल्कुल सही कहा आपने, क्योंकि उन अपेक्षाओं का पूरा होना केवल हमारे हाथ में नहीं होता और अधिकतर हमारे दुखों का कारण भी यही अपेक्षाएं होती हैं। दूसरी तरह की अपेक्षाओं का सफलता और असफलता हमारे ही प्रयास पर निर्भर करती है। हमें दुखी भी कम करती है, शायद इसलिए कि हम इनमें अपनी सहूलियत के हिसाब से कुछ बदलाव भी कर लेते हैं। और रही बात तीसरी तरह की अपेक्षाओं की तो उसमें हमें इस बात का ख्याल रखने की जरूरत है कि दूसरों की जिन अपेक्षाओं को हम पूरा नहीं कर सकते, तो उन अपेक्षाओं को दूसरों के अंदर और अधिक बढ़ावा ना दें।
आप के कलम में दम है ... बहुत खूब
ReplyDeleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteबहुत शानदार अजय भाई
ReplyDeleteबहुत शानदार अजय भाई
ReplyDeleteExcellent sir....Best wishes
ReplyDeleteबहुत ही शानदार लेख है अजय भैया, हमें अपेक्षाएं करते वक्त अपनी सीमा और आत्मविश्लेशण करना जरूरी है, इससे यह लाभ होगा कि महत्वकांक्षी होते हुए भी बहुत सारी अतिरिक्त परेशानियों से बचे रहेंगे।
ReplyDeleteबेहतरीन तरीके से आपने सामाजिक/मानसिक समस्याओं को उकेरा है वर्तमान समाज की भावनाओ को शब्दों में ढालने के लिए आप साधुवाद के उतराधिकारी है
ReplyDeleteअजय जी शुभकामनाएं आपकी जीवंत कलम को
Very true Bro. Keep it up
ReplyDeleteबहुत अच्छा लेख लिखा है भाई जी👍
ReplyDeleteबहुत ही उम्दा लिखा आपने अजय जी। चाह, अपेक्षा और तुलना, बस इन्हीं के बीच जीवन नौका, भंवर में अटकी रहती है। संवाद और समन्वय स्थापित कर पाएं तो निश्चित ही जीवन कहीं अधिक सुखमय और सरल हो जाए।
ReplyDeleteबहुत बहेतरीन ढंग से लिखा है
ReplyDeleteसुंदर और पठनीय लेख के लिए बहुत बधाई भैया | अपेक्षा मानवीय स्वभाव है ,पर तीनों अपेक्षाओं में संतुलन बहुत आवश्यक है | दूसरों से की जाने वाली अपेक्षाओं को भावना से जोड़ कर नहीं देखना ,स्वयं से की जाने वाली अपेक्षाओं के लिए जी तोड़ काम करना ,और दूसरों की अपेक्षाओं में मदद और इस्तेमाल के फर्क का भान होना बहुत आवश्यक है | सनद रहे ! अंततः ये दुनियादारी है |
ReplyDeleteबहुत खूब अजय ।अपेक्षाएँ और हम लेख पढ़ कर मैन उदेवेलीत तो बहुत हुआ ,इसलिए लिखने से अपने आप को रोक न सकी वस्तुतः अपेक्षाएँ जीवन की कसौटी है जिन पर हम दूसरो को परखने का प्रयास करते हैं। ओर शायद इन्ही अपेक्षाओं के चलते हम अपने सबंध भी निर्धारित कर लेते है जिससे ज्यादा अपेक्षा उससे उतना घनिष्ट संबंध।आपने बहुत अच्छा वर्गीकरण किया,लेकिन क्या हमारी खुद से केवल सफल होने ही अपेक्षाएँ होती है कुछ ओर नहीं ,शायद सफल होने से ज्यादा आवशयक है *जीवन* ओर जीवन से भी ज्यादा आवश्यक है उस जीवन को जीना जो कहीं न कहीं दूसरो की अपेक्षाओं पर निर्भर है।
ReplyDeleteबेहतरीन लेख 👏👏👏👌👌👌
ReplyDeleteBahut achha likha h. 👏🙂
ReplyDeleteNice....
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